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माँ - "यह कविता मेरी माँ को समर्पित है"

इस तरह मेरे गुनाहों को, वो धो देती है,
माँ जब गुस्से में होती है, तो रो देती है।

अभी जिन्दा है मेरी माँ, मुझे कुछ नहीं होगा,

घर से जब निकलता हूँ, तो दुआ भी साथ चलती है।

जब भी कश्ती मेरी, सैलाब में आ जाती है,

माँ दुआ करती हुई, मेरे ख्वाब में आ जाती है।