दौर - राजेश खन्ना

आप क्या जाने मुझको समझते हैं क्या,
मैं तो कुछ भी नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं...

इस कदर प्यार इतनी बड़ी भीड़ का, मैं रखूँगा कहाँ,
इस कदर प्यार मैं रखने के काबिल नहीं...

मेरा दिल मेरी जां, मुझको इतनी मोहब्बत ना दो दोस्तों,
सोच लो दोस्तों, इस कदर प्यार कैसे संभालूँगा मैं,
मैं तो कुछ भी नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं...

प्यार एक शख्स का भी अगर मिल सके,
तो बड़ी चीज़ है जिंदगी के लिए,
आदमी को मगर ये भी मिलता नहीं, ये भी मिलता नहीं...

मुझको इतनी मोहब्बत मिली आपसे,
ये मेरा हक नहीं, मेरी तकदीर है,
मैं ज़माने की नज़रों में कुछ भी ना था,
मेरी आँखों में अब तक वो तस्वीर है...

इस मोहब्बत के बदले मैं क्या नज़र दूं,
मैं तो कुछ भी नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं...

इज्जतें, चाहतें, शोहरतें, उल्फतें,
कोई भी चीज़ दुनिया में रहती नहीं,
आज मैं हूँ जहाँ, कल कोई और था.
ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था...

आज इतनी मोहब्बत ना दो दोस्तों,
की मेरे कल के खातिर, ना कुछ भी रहे,
आज का प्यार थोडा बचा के रखो, मेरे कल के लिए...

कल, कल जो गुमनाम है, कल जो सुनसान है,
कल जो अनजान है, कल जो वीरान है,
मैं तो कुछ भी नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं...