जा चुके हैं सब, और वही ख़ामोशी छाई है,
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है।
छूट चुकी है रेल, चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहाँ, जैसे सजी कोई महफ़िल खास थी।
अजनबी थे चेहरे सारे, फिर भी उनसे मुलाकात थी,
भेजी थी किसी ने अपनायियत, सलाम में वो क्या बात थी।
एक पल थे, आप जैसे कौसर, अब बची अकेली रात थी।
चलो अब लौट चलें यहाँ से,
छुट चुकी है रेल, अब यह गुजरी बात थी।
उड़ते कागज करते बयाँ,
इनको भी किसी से, दो पल की मुलाकात थी।
बढ़ चलें कदम, किनारे उन पत्थरों की,
कहानी जिनके, रोज़ ये साथ थी।
फिर आएगी दूजी रेल, फिर चिरेगी ये सन्नाटा,
और जिन्दगी से फिर मुलाकात थी।
फिर लौटेंगे और भारी क़दमों से,
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाकात थी।
छूट चुकी है रेल, अब सिर्फ काली स्याह रात थी।
पसरा है हर ओर सन्नाटा, तन्हाई मुस्कुराई है।
छूट चुकी है रेल, चंद लम्हों की तो बात थी,
क्या रौनक थी यहाँ, जैसे सजी कोई महफ़िल खास थी।
अजनबी थे चेहरे सारे, फिर भी उनसे मुलाकात थी,
भेजी थी किसी ने अपनायियत, सलाम में वो क्या बात थी।
एक पल थे, आप जैसे कौसर, अब बची अकेली रात थी।
चलो अब लौट चलें यहाँ से,
छुट चुकी है रेल, अब यह गुजरी बात थी।
उड़ते कागज करते बयाँ,
इनको भी किसी से, दो पल की मुलाकात थी।
बढ़ चलें कदम, किनारे उन पत्थरों की,
कहानी जिनके, रोज़ ये साथ थी।
फिर आएगी दूजी रेल, फिर चिरेगी ये सन्नाटा,
और जिन्दगी से फिर मुलाकात थी।
फिर लौटेंगे और भारी क़दमों से,
जैसे जिन्दगी से फिर मुलाकात थी।
छूट चुकी है रेल, अब सिर्फ काली स्याह रात थी।