उनको ये शिकायत है, मैं बेवफाई पे नहीं लिखता,
और मैं सोचता हूँ की, उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता।
खुद अपने से ज्यादा बुरा ज़माने में कौन है
मैं इसीलिए, औरों की बुराई पे नहीं लिखता।
कुछ आदतों से मजबूर हैं, और कुछ फिदरतो की पसंद है,
जख्म कितने भी गहरे हों, मैं उनकी दुहाई पे नहीं लिखता।
दुनिया का क्या है, हर हाल में इल्जाम लगाती है,
वरना क्या बात की मैं, कुछ अपनी सफाई पे नहीं लिखता।
शान-ए-अमीरी पे करूँ कुछ अर्ज़, मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की कमाई पर नहीं लिखता।
उसकी ताकत का नशा, मंत्र और कलमों में बराबर है,
मेरे दोस्तों, मैं मजहब की लड़ाई पे नहीं लिखता।
समंदर को परखने का, मेरा नजरिया अलग ही है, ऐ यारों,
मिजाजों पे लिखता हूँ, उसकी गहराई पे नहीं लिखता।
पराये दर्द को मैं, गज़लों में महसूस करता हूँ,
ये सच है, मैं सज़र से, फल की जुदाई पे नहीं लिखता।
तजुर्बा तेरी मोहब्बत का, ना लिखने की वजह बस ये है,
की शायर इश्क में, खुद अपनी तबाही पे नहीं लिखता।
और मैं सोचता हूँ की, उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता।
खुद अपने से ज्यादा बुरा ज़माने में कौन है
मैं इसीलिए, औरों की बुराई पे नहीं लिखता।
कुछ आदतों से मजबूर हैं, और कुछ फिदरतो की पसंद है,
जख्म कितने भी गहरे हों, मैं उनकी दुहाई पे नहीं लिखता।
दुनिया का क्या है, हर हाल में इल्जाम लगाती है,
वरना क्या बात की मैं, कुछ अपनी सफाई पे नहीं लिखता।
शान-ए-अमीरी पे करूँ कुछ अर्ज़, मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की कमाई पर नहीं लिखता।
उसकी ताकत का नशा, मंत्र और कलमों में बराबर है,
मेरे दोस्तों, मैं मजहब की लड़ाई पे नहीं लिखता।
समंदर को परखने का, मेरा नजरिया अलग ही है, ऐ यारों,
मिजाजों पे लिखता हूँ, उसकी गहराई पे नहीं लिखता।
पराये दर्द को मैं, गज़लों में महसूस करता हूँ,
ये सच है, मैं सज़र से, फल की जुदाई पे नहीं लिखता।
तजुर्बा तेरी मोहब्बत का, ना लिखने की वजह बस ये है,
की शायर इश्क में, खुद अपनी तबाही पे नहीं लिखता।