हुस्न-ए-इनायत के बगैर, कैसे जीता हूँ मैं,
उजड़े चमन में भी, एक फूल पिरोता हूँ मैं,
मेरी रियायत में खल रही है, सिर्फ तेरी कमी,
नयन के ओट में, पलकें भिंगोता हूँ मैं।
उजड़े चमन में भी, एक फूल पिरोता हूँ मैं,
मेरी रियायत में खल रही है, सिर्फ तेरी कमी,
नयन के ओट में, पलकें भिंगोता हूँ मैं।