शमा मौत का - रौशन केशरी

तेरी जुल्फों के तले यूँ ही बैठा रहूँ वक़्त दर वक़्त,
वक़्त गर यूँ ही थम जाती, तो शमा मौत का मुकम्मल होता

तेरी चाहत में काटें भी चुभ के फूल बन जाते,
गर कांटें ना होती, तो शमा मौत का मुकम्मल होता

तन्हाईयों में गुजरी है तेरे बगैर कई रातें,
गर ये रातें ना होती, तो शमा मौत का मुकम्मल होता

अयान-ऐ-मोहब्बत की दास्ताँ सुनाता हूँ इन बहारों को,
गर बहारें ना होती, तो शमा मौत का मुकम्मल होता