शहीद-ए-आजम - "भगत सिंह"

उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा,
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा ‌।

चखाएँगे मज़ा बर्बाद-ए-गुलशन का गुलचीं को,

बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा 

ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल,

पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा 

जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़ ,

न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा 

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है ,

सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा 

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले ,

वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा 

कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे,

जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा