-: वृहस्पतिवार व्रत
की विधि :-
वृहस्पतिवार को जो भी स्त्री-पुरुष व्रत करें
उन्हें चाहिए की दिन में एक ही बार भोजन करें, भोजन पीले पदार्थ जैसे की चने का
दाल, कदलीफल, दूध-केसर, पिला साबुदाना का हो । इस दिन नमक नहीं खाना चाहिए, बालों
को पिली मिट्टी से ना धोये, घर को गोबर से ना लीपें, कपडें धोबी के यहाँ ना धुलने
डालें । वृहस्पतिदेव के पूजन में केले के पेड़ की पूजा करनी चाहिए, दीया जलावें,
पिला चन्दन करें, पिला पुष्प अर्पित करें, पिला वस्त्रा धारण करें, प्रसाद चने की
दाल, गुड़ और मुनक्का का सर्वोतम होता है । पूजन में सम्पूर्ण कथा और आरती के बाद
प्रसाद वितरण करना चाहिए । इस व्रत को करने से विष्णु भगवान प्रसन्न होते हैं व
धन, पुत्र, विधा तथा मनवांछित फल मिलता है और परिवार को सुख-शांति का लाभ होता है,
साथ ही अन्य आने वाले कष्ट से छुटकारा मिलता है । तन, मन, क्रम और वचन से शुद्ध
होकर जो इच्छा हो वृहस्पतिदेव से प्रार्थना करनी चाहिए । उनकी इच्छाओं को
वृहस्पतिदेव भगवान अवश्य पूर्ण करेंगे, ऐसा मन में दृढ विश्वास रखना चाहिए ।
-: अथ श्री वृहस्पतिवार व्रत कथा :-
प्राचीनकाल में भारतवर्ष में एक
राजा राज्य करता था, वह बड़ा प्रतापी
तथा दानी राजा था । वह नित्य पूजा पाठ करता तथा ब्राहमण और गुरु की सेवा किया करता
था । ऊसके दरवाजे से कोई भी याचक निरास होकर नहीं लौटता था । यह बात उसकी रानी को
अच्छा न लगता । न वह व्रत करती और न ही किसी को एक पैसा दान में देती। राजा को भी
ऐसा करने से मना किया करती ।
एक समय की बात है कि
राजा शिकार खेलने वन को चले गए । घर पर रानी और दासी थी । उस समय गुरु वृहस्पति
भगवान साधु का रुप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए । साधु ने रानी से
भिक्षा मांगी तो वह कहने लगी, हे साधु महाराज - मैं इस दान और पुण्य से तंग आ
गई हूँ, आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे यह सारा धन नष्ट हो जाये और मैं आराम से
रह सकूं । साधु रुपी वृहस्पति देव ने कहा, हे देवी - तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से
कोई दुखी नहीं होता, पापी भी धन और पुत्र की इच्छा रखते हैं, अगर
तुम्हारे पास धन अधिक है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, जिससे
तुम्हारे दोनों लोक सुधरें । परन्तु साधु की इन बातों से रानी खुश नहीं हुई ।
उसने कहा, मुझे ऐसे धन की कोई आवश्यकता नहीं, जिसे
मैं अन्य लोगों को दान दूं तथा जिसको रखने और संभालने में ही मेरा सारा समय नष्ट
हो जाये ।
साधु ने कहा, यदि
तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो जैसा मैं तुम्हें बताता हूं, तुम वैसा ही करना ।
वृहस्पतिवार के दिन तुम घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिट्टी से धोना, केशों
को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन
में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहाँ धुलने डालना । इस प्रकार सात
वृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जायेगा । इतना कहकर साधु बने
वृहस्पतिदेव अंतर्धान हो गये ।
साधु के कहे अनुसार
करते हुए रानी को केवल तीन वृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट
हो गई । भोजन के लिये परिवार तरसने लगा । एक दिन राजा रानी से बोला, हे रानी
- तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहां पर मुझे सभी जानते है, इसलिये मैं
कोई छोटा कार्य नही कर सकता । ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया, वहां वह जंगल से लकड़ी
काटकर लाता और शहर में बेचता, इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा । इधर, राजा के
बिना रानी और दासी दुखी रहने लगीं । एक समय जब रानी और दासियों को सात दिन बिना
भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी
दासी से कहा, हे दासी - पास ही के
नगर में मेरी बहन रहती है, वह बड़ी धनवान है, तू उसके पास जा और कुछ ले आ ताकि
थोड़ा-बहुत गुजर-बसर हो जाए ।
दासी रानी की बहन के
पास गई । उस दिन वृहस्पतिवार था । रानी का बहन उस समय वृहस्पतिवार की कथा सुन रही
थी । दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन
रानी की बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया । जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं
मिला तो वह बहुत दुखी हुई और उसे क्रोध भी आया । दासी ने वापस आकर रानी को सारी
बात बता दी । सुनकर, रानी ने
अपने भाग्य को कोसा ।
उधर, रानी की
बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, परन्तु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुखी हुई होगी । कथा सुनकर और
पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर गई और कहने लगी, हे बहन - मैं वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी,
तुम्हारी दासी गई परन्तु जब तक कथा होती है, तब तक न उठते है और न बोलते है, इसीलिये मैं नहीं बोली । कहो, दासी
क्यों आयी थी । रानी बोली, बहन । हमारे घर अनाज नहीं था । ऐसा कहते-कहते
रानी की आंखें भर आई । उसने दासियों समेत भूखा रहने की बात भी अपनी बहन को बता दी
।
रानी की बहन बोली, बहन देखो । वृहस्पतिदेव भगवान सबकी मनोकामना
पूर्ण करते है । देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो ।
यह सुनकर दासी घर के अन्दर गई तो वहाँ उसे एक घड़ा अनाज का भरा मिल गया । उसे
बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि उसे एक एक बर्तन देख लिया था । उसने बाहर आकर रानी को
बताया । दासी रानी से कहने लगी, हे रानी । जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत
ही तो करते है, इसलिये क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली
जाये, हम भी व्रत किया करेंगे । दासी के कहने पर रानी
ने अपनी बहन से वृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा । उसकी बहन ने बताया, वृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का
से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलायें । पीला भोजन करें
तथा कथा सुनें । इससे गुरु भगवान प्रसन्न होते है, मनोकामना पूर्ण करते है । व्रत और पूजन की विधि
बताकर रानी की बहन अपने घर लौट आई ।
रानी और दासी दोनों ने
निश्चय किया कि वृहस्पतिदेव भगवान का पूजन जरुर करेंगें । सात रोज बाद जब
वृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा । घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन लाईं
तथा उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया । अब पीला भोजन कहाँ
से आए । दोनों बड़ी दुखी हुई । परन्तु उन्होंने व्रत किया था इसलिये वृहस्पतिदेव
भगवान प्रसन्न थे । एक साधारण व्यक्ति के रुप में वे दो थालों में सुन्दर पीला
भोजन लेकर आए और दासी को देकर बोले, हे दासी - यह भोजन तुम्हारे और तुम्हारी रानी के
लिये है, इसे तुम दोनों ग्रहण करना । दासी भोजन पाकर बहुत
प्रसन्न हुई । उसने रानी को सारी बात बतायी ।
उसके बाद से वे
प्रत्येक वृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और पूजन करने लगी । वृहस्पति भगवान की
कृपा से उनके पास धन हो गया । परन्तु रानी फिर पहले की तरह आलस्य करने लगी । तब
दासी बोली, देखो रानी । तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती
थी, तुम्हें धन के रखने में कष्ट होता था, इस कारण
सभी धन नष्ट हो गया । अब गुरु भगवान की कृपा से धन मिला है तो फिर तुम्हें आलस्य
होता है । बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिये हमें दान-पुण्य करना चाहिये । अब तुम
भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राहमणों
को दान दो, कुआं-तालाब-बावड़ी आदि का निर्माण कराओ, मन्दिर-पाठशाला बनवाकर ज्ञान दान दो, कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ अर्थात् धन को
शुभ कार्यों में खर्च करो, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़े तथा स्वर्ग
प्राप्त हो और पित्तर प्रसन्न हों । दासी की बात मानकर रानी शुभ कर्म करने लगी,
जिससे उसका काफी यश फैलने लगा ।
एक दिन रानी और आपस
में विचार करने लगी की ना जाने राजा किस दशा में होंगे, उनकी कोई खबर भी नहीं ।
उन्होंने गुरु भगवान से श्रद्धा पूर्वक प्रार्थना की, की राजा जहाँ कही भी हो
शीघ्र वापस आ जाए । उसी रात भगवान वृस्पतिदेव ने राजा को स्वप्न में कहा – “हे
राजा उठ, तेरी रानी तुझको याद करती है, अब अपने देश को लौट जा । राजा प्रातः कल
उठकर, जंगल से लकड़ी काटने को चल पड़ा । एक पेड़ के निचे राजा अपनी पुरानी बातों को
याद कर सोचने लगा । उसी समय तत्काल गुरु वृहस्पति देव साधु के रूप में प्रकट हुए,
और लकडहारे के पास आके बोले – “हे लकडहारे तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में
बैठे हो, मुझको बतलाओ” । यह सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया ।
उसने साधु की वंदना
कर बोला – “हे प्रभो आप सब कुछ जानने वाले हैं”, इतना कहकर राजा ने साधु को अपनी
संपूर्ण कहानी बतला दी । महात्मा दयालु होते है, वे राजा से बोले – हे राजन –
तुम्हारी स्त्री ने वृहस्पति देव के प्रति अपराध किया था, जिसके कारण तुम्हारी यह
दशा हुई । अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो, भगवान तुम्हे पहले से अधिक धन
देंगे, देखो – तुम्हारी पत्नी ने वृहस्पति देव का व्रत प्रारंभ कर दिया है, अब तुम
भी वृहस्पति वार का व्रत करके, चने की दाल, गुड़ तथा जल को लोटे में डालकर भगवान
विष्णु का पूजन करो, फिर कथा कहो या सुनो, भगवान तुम्हारी सभी कामनाओ को पूर्ण
करेंगे” ।
साधु को प्रसन्न
देखकर राजा बोला – “हे प्रभो – मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं बचता जिससे भोजन के
उपरांत कुछ बचा सकूँ, मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है, मेरे पास
कोई साधन भी नहीं, जिससे उसका समाचार जान सकूँ, फिर मैं वृहस्पति देव की क्या
कहानी कहूं, यह भी मुझको नहीं मालूम” । साधु ने कहा – “हे राजन – तुम किसी प्रकार
की चिंता मत करो, वृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़िया लेकर शहर को जाना,
तुम्हे रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा
वृहस्पति देव की पूजा का सामान भी आ जायेगा, और जो तुमने वृहस्पतिवार के कथा के
बारे में पूछा है, वो इस प्रकार है” ।
-: वृहस्पतिदेव की कथा :-
प्राचीन काल में एक
बहुत ही निर्धन ब्राहमण था, उसकी कोई संतान नहीं थी । उसकी स्त्री बहुत मलिनता के
साथ रहती थी । वह न स्नान करती, ना किसी देवता का पूजन करती, इससे ब्राहमण देवता
बड़े दुखी रहते थे, बेचारे बहूत कुछ कहते थे, किन्तु उसका कोई परिणाम ना निकला ।
भगवान की कृपा से ब्राहमण की स्त्री को कन्या-रूपी रत्न पैदा हुई । कन्या बड़ी होने
पर प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन व व्रत करने लगी । अपनी पूजा-पाठ
समाप्त करके पाठशाला जाती तो, अपने मुट्ठी में जौ भरके ले जाती, और पाठशाला के
मार्ग में डालती जाती । लौटते समय वही जौ स्वर्ण के हो जाते थे, जिसे वो बीनकर घर
ले आती थी ।
एक दिन वह बालिका
सूप में उन सोने के जौ को फटककर साफ़ कर रही थी की माँ ने कहा – बेटी सोने के जौ को
फटकने के लिए सोने का सूप भी तो होना चाहिए । अगले रोज वृहस्पतिवार था, कन्या ने
श्रद्धापूर्वक वृहस्पतिदेव से सोने का सूप देने की प्रार्थना की । वृहस्पतिदेव ने
उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाते हुए जाने लगी,
जब वह लौटकर जौ बीन रही थी तो उसे वृहस्पतिदेव की किरपा से सोने का सूप पड़ा मिला,
उसे वह घर ले आयी, और उससे जौ साफ़ करने लगी ।
एक दिन कन्या सोने
के सूप में जौ साफ़ कर रही थी, उसी समय नगर का राजकुमार वहां से गुजरा । इस कन्या
के रूप और कार्य को देखकर उसपे मोहित हो गया । राजमहल आकर भोजन तथा जल त्यागकर
उदास होकर लेट गया । राजा को जब इस बात का पता चला तो प्रधानमंत्री के साथ उसके
पास गए और बोले – बेटा तुम्हे किस बात का कष्ट है, किसी ने तुम्हारा अपमान किया है
अथवा कोई और कारण है सो कहो, मैं वही कार्य करूँगा जिससे तुम्हे प्रसन्नता हो ।
अपने पिता की राजकुमार ने बातें सुनी और कहा – पिताजी मुझे आपकी कृपा से किसी बात
का दुःख नहीं है, किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है, परन्तु मैं उस लड़की के साथ
विवाह करना चाहता हूँ, जो सोने के सूप में जौ साफ़ कर रही थी ।
यह सुनकर राजा
आश्चर्य में पड़ा और बोला – हे बेटा – इसतरह की कन्या का पता तुम ही लगावो, मैं
उसके साथ तुम्हारा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा । राजकुमार ने तब उस लड़की के घर का
पता भी बतलाया । मंत्री उस लड़की के घर गया, और ब्राहमण के समक्ष राजा की ओर से
राजुमार से विवाह का प्रस्ताव रखा । ब्राहमण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का
विवाह करने के लिए तैयार हो गया । कुछ ही दिन बाद ब्राहमण के कन्या का विवाह
राजकुमार के साथ संपन्न हो गया ।
कन्या के घर से जाते ही, पहले की भांति ब्राहमण के घर में गरीबी का निवास हो
गया । अब भोजन के लिए अन्न भी बड़ी मुसकिल से मिलता था । एक दिन दुखी होकर ब्राहमण
देवता अपने पुत्री के पास गए । बेटी ने पिता के दुखी अवस्था को देखा और माँ का हाल
पूछा । पिता ने सारा हाल बता दिया । कन्या ने बहूत सारा धन देकर अपने पिता को विदा
कर दिया । इस तरह ब्राहमण का कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत हुआ, पर कुछ समय बाद फिर
वही हाल हो गया ।
ब्राहमण फिर अपनी पुत्री के पास गया, और सारा हाल कहा तो लड़की बोली – हे पिताजी
आप माताजी को यहाँ लिवा लाओ, मैं उन्हें वो बिधि बतला दूंगी जिससे गरीबी दूर हो
जाए । वह ब्राहमण देवता अपने स्त्री को साथ लेकर राजमहल पहुचे । लडकी ने माँ को
समझाया – हे माँ तुम प्रातः स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब
दरिद्रता दूर हो जाएगी । परन्तु उसकी माँ ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातः काल
उठकर अपनी पुत्री का बचा जूठन खा लिया । इससे उसकी पुत्री को भी बहूत गुस्सा आया
और एक रात को कोठरी से सारा निकाल दिया और अपनी माँ को उसमें बंद कर दिया । प्रातः
काल उसे निकाला तथा स्नानादि कराकर पूजा-पाठ करवाया तो उसकी माँ की बुद्धि ठीक हो
गयी और फिर प्रत्येक वृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी ।इस व्रत के प्रभाव से उसके माँ-बाप
धनवान और पुत्रवान हो गए और वृहस्पति देव की कृपा से इस लोक के सुख को भोगकर
स्वर्ग को प्राप्त हुए ।
इस तरह से कहानी
कहकर साधु देवता वहां से चले गए । धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर वृहस्पतिवार का
दिन आया, राजा उस दिन लकड़िया लेकर शहर को गया, उस दिन उसे रोज से दुगुना धन मिला ।
राजा ने चना-गुड़ आदि लाकर वृहस्पतिवार का व्रत किया, उस दिन से उसके सभी कलेश दूर
हो गए । पर जब अगला वृहस्पतिवार आया तो राजा व्रत करना भूल गया, जिससे वृहस्पतिदेव
भगवान नाराज हो गए ।
उसी रोज उस नगर के
राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया और समस्त राज्य में घोषणा करवा दी की सभी
नगरवासी मेरे यहाँ भोजन करने आवे, किसी के घर चूल्हा नहीं जलेगा, जो भी इस आज्ञा
को नहीं मानेगा उसे अपराधी समझकर भारी दंड दिया जायेगा । लकडहारा भी इस घोषणा को
सुना, पर काम में व्यस्तता के कारण देर से पहुंचा । इसीलिए राजा उसे अपने साथ महल
में ले जाकर भोजन करवा रहे थे । तभी रानी
की दृष्टी उस खूंटी पे पड़ी जिसपर उसका हार लटका हुआ था, वह हार वहां दिखाई नहीं
दिया । उस समय सिर्फ लकड़हारा ही उस कक्ष में था । रानी को यकीन हो गया की उसका हार
इसी लकडहारे ने चुरा लिया है, उसी समय सैनिक बुलवा कर उसे जेलखाने में डलवा दिया ।
राजा जेल में विचार
करने लगा की ना जाने की कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह कष्ट प्राप्त हुआ,
और जंगल में मिले उस साधू को याद करने लगा । तत्काल वृहस्पतिदेव भगवान साधू के रूप
में प्रकट हुए और कहे – अरे मुर्ख तूने आज वृहस्पतिदेवता की कथा नहीं कही, जिसके
कारण तुझे यह कष्ट प्राप्त हुआ है, परन्तु चिंता मत कर, अगले गुरुवार को तुझे
जेलखाने के दरवाजे पे चार पैसे मिलेंगे, उस से तू प्रसाद मंगवा कर कथा कहना तो
तेरे सभी कष्ट दूर हो जायेंगे । राजा को अगले गुरुवार को चार पैसे मिले, उससे वो चना-गुड़
मंगवा कर कथा कही और प्रसाद बाँटा । उसी रात वृहस्पतिदेव भगवान् उस नगर के राजा के
सवप्न में आये और आदेश दिया – हे राजन तूने जिसे जेलखाने में बंद किया है, वो
निर्दोष है, वो राजा है, उसे कल छोड़ देना । राजा सुबह उठा और खूंटी पर हार टंगा
देख लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी, और राजा के योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण भेंट कर
विदा किया ।
गुरुदेव की
आज्ञानुसार राजा अपने नगर को चल दिया । राजा जब नगर के निकट पहुंचा तो देखा की,
नगर में पहले से अधिक बाग़- तालाब, कुएँ, धर्मशालाएं बने हुए हैं । राजा के पूछने
पर जब नगरवासीयों ने बताया की – ये सब रानी और दासी ने बनवाए हैं, तो राजा को
आश्चर्य हुआ, और गुस्सा भी आया की उसकी अनुपस्थिति में रानी के पास धन कहाँ से आया
होगा । जब रानी ने सुना की राजा आ रहे हैं, तो दासी से कहा – हे दासी देख राजा हमको
कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे, वे हमारी ऐसी हालत देखकर वापस ना लौट जाए, इसीलिए
तू दरवाजे पर खड़ी हो जा, और जब राजा आये तो उन्हें अपने साथ लिवा लाना ।
रानी की आज्ञा मान
दासी दरवाजे पर खड़ी हो गयी, और जब राजा आये तो उन्हें अपने साथ महल में लिवा लायी ।
तब राजा को रानी से ज्ञात हुआ की, ये सब धन उसे वृहस्पतिदेव की कृपा से प्राप्त
हुआ है । फिर राजा ने निश्चय किया की सात रोज बाद तो सभी व्रत करते है, पर मैं अब
रोजाना व्रत किया करूँगा और कथा कहा करूँगा । अब हर समय राजा के दुपट्टे में चना
की दाल बंधी रहती और दिन में कथा किया करता ।
एक दिन राजा ने
निश्चय की चलो बहन के यहाँ हो आऊ । इस तरह का निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपने
बहन के यहाँ चल दिया । रास्ते में देखा की कुछ आदमी मुर्दे को लिए जा रहे है, उसे
याद आया की आज उसने वृहस्पतिवार की कथा नहीं कही । उसने उन्हें रोककर कहा – अरे
भाइयों मेरी वृहस्पतिदेव की कथा सुन लो । लोगो नें कहा – लो हमारा तो आदमी मर गया
है, पर इसको कथा की पड़ी है, पर कुछ लोगों ने कहा, अच्छा ठीक है, तुम अपनी कथा
चलते-चलते सुना दो । राजा ने दाल निकली और कथा कहनी शुरू कर दी, जब कथा आधी हुई तो
मुर्दा हिलने लगा, और जब कथा समाप्त हुई तो राम-राम कहकर वो जीवित हो उठा ।
राजा आगे बढा, उसे
एक किसान खेत में हल चलाता मिला, राजा नें उस से कथा सुनने का आग्रह किया तो किसान
ने कहा – जब तक तेरी कथा सुनूंगा उतनी देर में चार हरैया जोत लूँगा, वह नहीं माना ।
राजा आगे चल पड़ा , राजा के आगे बढ़ते ही बैल पछाड़ खा के गिर पड़े और किसान के पेट
में बहूत जोर से दर्द होने लगा । उसी समय किसान की माँ रोटी लेकर आयी, और बेटे से
पूछा तो, बेटे ने सभी हाल कह सुनाया । बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गयी और
कहा – मैं तेरी कथा सुनूंगी, तू अपनी कथा मेरे खेत पे चल के कहना । राजा नें लौटकर
उस बुढ़िया की खेत पे जाकर कथा कही, जिसको सुनकर दोनों बैल उठ खड़े हो गए और किसान
के पेट का दर्द बंद हो गया ।
राजा जब बहन के घर
पहुँचा तो, बहन नें भाई की खूब मेहमानी की । अगले रोज राजा प्रातः काल जगा तो देखा
की सब लोग भोजन कर रहे हैं । राजा ने अपने बहन से पूछा – ऐसा कोई मनुष्य है जिसने
भोजन ना किया हो, वो मेरी वृहस्पतिदेव की कथा सुन ले, क्यूंकि मैं किसी भूखे को
कथा कहे बगैर अन्न ग्रहण नहीं करूँगा । राजा की बहन ने कहा – हे भैया, इस घर में
क्या पूरे नगर में भी एक भी व्यक्ति ऐसा आपको नहीं मिलेगा जिसने भोजन ना किया हो,
ये देश ऐसा ही है, यहाँ पहले लोग भोजन करते हैं, बाद में कोई अन्य कार्य करते हैं ।
फिर वो ढूढ़ते- ढूढ़ते
एक कुम्हार के घर गयी, उसे पता चला की उसका लड़का बीमार है, जिसकी वजह से तीन दिन
से किसी ने भोजन नहीं किया । राजा की बहन ने कुम्हार से अपने भाई की कथा सुन ने का
आग्रह की, वह तैयार हो गया । राजा ने जाकर कुम्हार के घर पे कथा कही, जिसको सुनते
ही, कुम्हार का लड़का ठीक हो गया । अब तो राजा की प्रसंसा होने लगी ।
एक दिन राजा ने अपनी
बहन से कहा की – बहन मई अपने घर को जाऊंगा तुम भी तैयार हो जाओ । राजा की बहन नें
अपने सास से अपने भाई के साथ जाने की आज्ञा मांगी । सास बोली – चली जा, परन्तु
मेरे पोतों को मत ले जाना, क्यूंकि तेरे भी की कोई संतान नहीं होती । राजा की बहन
ने राजा से कहा – हे भैया मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जायेगा । राजा दुखी मन
से बहन से कहा – जब कोई बालक ही नहीं जायेगा तो तुम जाकर क्या करोगी ।
राजा निरास हो अकेले ही अपने नगर को लौट आया और दुखी हो सैय्या पर लेट गया ।
तब रानी ने पूछा की आप बहन को लाने को कह के गए थे, उसे साथ क्यूँ नहीं लाये । तब
राजा ने कहा – हे रानी हमारा कोई संतान नहीं है, इसी कारण कोई हमारे घर आना पसंद
नहीं करता । रानी ने कहा – आप चिंता मत कीजिये, वृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया
है, वे हमें संतान भी अवश्य देंगे । जब अगला वृहस्पतिवार आया तो रानी नें व्रत रखा
और पुत्र की इच्छा प्रकट की । उसी रात्रि में वृहस्पतिदेव भगवान राजा के स्वप्न
में आये और कहे – उठ राजन, सभी सोच को त्याग दे, तेरी रानी गर्भवती है । राजा को
यह जानकार बहुत ख़ुशी हुई, नवें महीने में रानी ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया ।
तब राजा बोले – हे रानी स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह
सकती, इसीलिए जब मेरी बहन आवे तो उस से कुछ मत कहना, रानी ने हां कर दी । जब राजा
की बहन ने यह शुभ समाचार सुना तो बधाई लेकर अपने भाई के यहाँ पहुंची, तो रानी ने
कहा – घोड़ा चढ़कर नहीं आयी, गधा चढ़कर आयी । राजा की बहन ने कहा – भाभी यदि मैं इस
प्रकार नहीं कहती तो तुम्हारे घर संतान कैसे होता ।
वृहस्पतिदेव भगवान् ऐसे ही है, जिसके मन में जो कामनाएं है सभी को पूर्ण करते
हैं । जो सद्भावना पूर्वक वृहस्पतिवार का व्रत करता है, कथा पढता है, सुनता है
अथवा दूसरों को सुनाता है, भगवान् उसकी सभी मनोकामनाओ को पूर्ण करते हैं, भगवान्
वृहस्पतिदेव उनकी सदैव रक्षा करते है । जैसे सच्ची भावना से राजा और रानी ने वृहस्पति
देवता के कथा का गुणगान किया था तो उनकी सभी इच्छाएं वृहस्पतिदेव ने पूर्ण की थी ।
कभी अनजाने में भी वृहस्पतिदेव की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, इस से घर की सुख-शांति
नष्ट हो जाती है । इसीलिए सब को कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए । हृदय
से उनका मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए ।
॥ इति श्री वृहस्पतिवार व्रत कथा ॥
-: आरती श्री वृहस्पतिदेव जी की :-
-: आरती श्री वृहस्पतिदेव जी की :-
जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ।स्वामी।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥ॐ॥
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥ॐ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।स्वामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ॐ॥
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ॐ॥
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता ।स्वामी।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥ॐ॥
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥ॐ॥
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े ।स्वामी।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े ॥ॐ॥
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े ॥ॐ॥
दीनदयाल, दयानिधि, भक्तन हितकारी ।स्वामी।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥ॐ॥
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥ॐ॥
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारी ।स्वामी।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥ॐ॥
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥ॐ॥
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहत गावे ।स्वामी।
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥ॐ॥
जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥ॐ॥
प्रेम से बोलिए –
“वृहस्पतिदेव भगवान् की – जय”, “विष्णु भगवान की – जय”