किरदार - जगजीत सिंह

किसी अजनबी को, मेरा लिखा सुना रहा था वो,
बिखरे हुए ख्वाबों के, पुर्जे उड़ा रहा था वो।

उम्र भर पिसता रहा वो, रिश्तो की चक्की में,

बांकी रहे रिश्तों से, दामन छुड़ा रहा था वो।

अपनी जिद्द तो वो, पूरी ना कर सका,

रूठे हुए बच्चों को, मना रहा था वो।

सेहरा में खिले फूल को, बचाने के लिए,

अपने अश्को से, उसकी प्यास मिटा रहा था वो।

उसकी यादों को, कुछ इस तरह भुला रहा था,

अपने हाथों, अपना लिखा, मिटा रहा था वो।

सिर्फ किरदार ही तो, बदले थे उसने,

अपनी ही कहानी, सुना रहा था वो।