बदनाम था, खुदगर्ज़ था, वो यार ही कब था,
उसको तेरी जानिब से, भला प्यार ही कब था।
बेकार क्यूँ लगाते हो इल्जाम, उसके सर,
वो इश्क के दुनिया का, गुनाहगार ही कब था।
तुम उसकी रिहायी के लिए, क्यूँ हो परेशान,
वोह तेरी जुल्फों में, गिरफ्तार ही कब था।
हक छीन लिए जाते हैं, दुनिया में दोस्तों,
ऐ रोने वाले, तू कभी हक़दार ही कब था।
इकतरफा तूने प्यार किया उससे, ऐ केशरी,
वो तेरे चाहत का, तलबगार ही कब था।